__________________________ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (Biography)

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (Biography)

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

जीवन परिचय:- 

हिंदी साहित्य जगत में 'महाप्राण' के नाम से विख्यात सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' आधुनिक हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों (जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और निराला) में से एक हैं। वे एक महान कवि होने के साथ-साथ उपन्यासकार, निबंधकार, कहानीकार और अनुवादक भी थे। उनका पूरा जीवन संघर्ष, विद्रोह, करुणा और अद्वितीय सर्जनात्मकता का एक अनूठा दस्तावेज रहा है।  

1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल एकादशी, संवत् 1953 (तदनुसार 21 फरवरी, 1896 ई.) को हुआ था। हालाँकि उनकी जन्मतिथि को लेकर कुछ मतभेद भी हैं, किंतु निराला जी स्वयं वसंत पंचमी के दिन अपना जन्मदिन मनाते थे।  

उनके मूल पूर्वज उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के 'गढ़कोला' गाँव के निवासी थे। उनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी एक सीधे-साधे और कठोर अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे, जो बंगाल की महिषादल रियासत में एक छोटी सी नौकरी (सिपाही) करते थे। पिता की नौकरी बंगाल में होने के कारण निराला जी का बचपन और शुरुआती जीवन वहीं बीता।  

2. प्रारंभिक शिक्षा और भाषा-ज्ञान  

बालक सूर्यकांत की शुरुआती शिक्षा बंगाली माध्यम से महिषादल में ही हुई। उनका मन पारंपरिक स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा घूमने, कुश्ती लड़ने, तैरने और संगीत में रमता था। उन्होंने औपचारिक शिक्षा हाई स्कूल (नौवीं-दसवीं कक्षा) तक ही प्राप्त की।  

इसके उपरांत उन्होंने अपनी जिजीविषा और स्वाध्याय के बल पर घर पर ही संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का गहन अध्ययन किया। उन्हें हिंदी का औपचारिक ज्ञान उनकी पत्नी के आग्रह और प्रेरणा से प्राप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने बांग्ला को छोड़कर हिंदी में ही अपनी संपूर्ण रचनाधर्मिता को समर्पित कर दिया।  

3. जीवन के आघात और संघर्ष

निराला जी का व्यक्तिगत जीवन अत्यधिक दुखों, त्रासदियों और संघर्षों से भरा रहा। जब वे मात्र तीन वर्ष के थे, तभी उनकी माता का साया उनके सिर से उठ गया। युवावस्था में पहुँचते-पहुँचते उनके पिता का भी देहांत हो गया।  

उनका विवाह बहुत कम उम्र में ही मनोहरा देवी के साथ हो गया था, जो सुसंस्कृत और संगीतप्रेमी थीं। कुछ समय तक उनका वैवाहिक जीवन ठीक रहा, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद फैली भयानक महामारी (स्पेनिश फ्लू) ने उनके जीवन को उजाड़ दिया। इस महामारी और अन्य कारणों से उन्होंने अपनी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई, भाभी और अंत में अपनी विधवा पुत्री सरोज को भी एक-एक करके खो दिया।  

परिवार के प्रियजनों की एक के बाद एक हुई मौतों ने उन्हें अंदर से झकझोर कर रख दिया था। इन व्यक्तिगत दुखों की गहरी छाप उनकी प्रसिद्ध कविताओं जैसे 'सरोज-स्मृति' और 'स्नेह निर्झर बह गया है' में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

4. साहित्यिक जीवन और कार्यपद्धति

जीवन की विषम परिस्थितियों और आर्थिक तंगी के बावजूद निराला जी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कलकत्ता (कोलकाता) से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कार्य किया।  

उन्होंने रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित 'समन्वय' पत्रिका का संपादन किया।  

इसके बाद उन्होंने 'मतवाला' पत्रिका के संपादक मंडल में भी अपनी सेवाएँ दीं।

कुछ समय पश्चात वे लखनऊ आ गए और 'गंगा पुस्तक माला' कार्यालय से जुड़कर 'सुधा' मासिक पत्रिका का संपादन कार्य संभाला।  

जीवन का अंतिम दौर उन्होंने उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयाग) शहर के दारागंज मोहल्ले में स्थित एक किराए के कमरे में बिताया, जहाँ गंगा के तट पर उनका अधिकांश समय बीता।

5. हिंदी साहित्य में योगदान और विशेषताएँ 

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को हिंदी कविता में 'मुक्तछंद' (रबर छंद या केंचुआ छंद) का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने कविता को पारंपरिक और रूढ़िवादी छंदों के बंधनों से मुक्त कराया। उनके प्रसिद्ध कथन के अनुसार—  

"मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है।"  

उनकी काव्यगत और साहित्यिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:  

विद्रोह और क्रांति के स्वर:- निराला जी का व्यक्तित्व अत्यंत विद्रोही और क्रोधी स्वभाव का था। उन्होंने समाज के शोषक वर्ग, असमानता और रूढ़िवादिता पर तीखा प्रहार किया तथा हमेशा शोषित, पीड़ित और उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त की।  

प्रकृति चित्रण:- छायावादी कवि होने के नाते उनकी कविताओं में प्रकृति का बहुत ही सुंदर, सजीव और मानवीकृत रूप देखने को मिलता है। 'संध्या सुंदरी' और 'जूही की कली' जैसी रचनाएँ इसका उत्कृष्ट प्रमाण हैं।  

दार्शनिकता और रहस्यवाद:- उनकी कविताओं में वेदांत दर्शन तथा रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानंद के विचारों का गहरा प्रभाव झलकता है।  

ओज और औदात्य:- उनकी लंबी और प्रसिद्ध कविताओं में अद्वितीय ओज, शक्ति और प्रवाह पाया जाता है।  

6. प्रमुख रचनाएँ  

निराला जी ने पद्य और गद्य दोनों विधाओं में प्रचुर मात्रा में उच्च कोटि का साहित्य सृजन किया। उनकी प्रमुख कृतियों का विवरण इस प्रकार है:

(क) प्रमुख काव्य-संग्रह:-

अनामिका (1923) (इसी में उनकी प्रसिद्ध लंबी कविताएँ 'राम की शक्ति-पूजा' और पुत्री की याद में रचित 'सरोज-स्मृति' संकलित हैं)  

परिमल (1930)  

गीतिका (1936)  

तुलसीदास (1939)  

कुकुरमुत्ता (1942) (व्यंग्य प्रधान लंबी कविता)  

अणिमा (1943), बेला (1946), नए पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953) और गीत कुंज (1954)  

(ख) उपन्यास:-  

अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्ली भाट, और बिल्लेसुर बकरिहा। (इनमें से कुछ उपन्यास उनके आत्मकथात्मक संस्मरणों के रूप में भी बहुत प्रसिद्ध हैं।)

( ग ) कहानी संग्रह:-

लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार आदि।

(घ) निबंध व आलोचना:-

चाबुक, प्रबन्ध पद्म, चयन आदि।

उनके संपूर्ण साहित्य को बाद में 'निराला रचनावली' के नाम से आठ खंडों में प्रकाशित किया गया।  

7. निधन  

जीवनभर अपार कष्टों, साहित्यिक उपेक्षाओं और विषम आर्थिक स्थितियों से जूझते हुए भी इस महान साहित्यकार ने अपनी कला से कभी समझौता नहीं किया। अंततः हिंदी साहित्य को अपनी अमूल्य रचनाओं से समृद्ध करने वाले महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 15 अक्टूबर, 1961 को प्रयाग (इलाहाबाद) में परलोक सिधार गए।

निराला जी हिंदी साहित्य के आकाश में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी ओजस्वी वाणी, क्रांतिकारी तेवर और करुणा से ओत-प्रोत रचनाएँ सदैव पाठकों को प्रेरित करती रहेंगी।  

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